क्या सेना का धर्म से जुड़ाव है भगवाकरण? – उपेंद्र द्विवेदी विवाद की पूरी सच्चाई

  • July 6, 2025

विवाद की शुरुआत: एक सामान्य मुलाकात या सेना का भगवाकरण?

भारतीय सेना का धर्म से जुड़ाव एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी की हिंदू संत स्वामी रामभद्राचार्य से मुलाकात की तस्वीरें वायरल हुईं, जिसे लेकर सेना भगवाकरण का विवाद शुरू हो गया है। इस मुलाकात में वे सेना की वर्दी में थे और सम्मानपूर्वक संत के सामने खड़े थे। इसके तुरंत बाद कई राजनीतिक दलों और कुछ मीडिया समूहों ने आरोप लगाया कि यह सेना का भगवाकरण है।

सेना का भगवाकरण विवाद में उपेंद्र द्विवेदी की स्वामी रामभद्राचार्य से मुलाकात की तस्वीर।

लेकिन सवाल यह है — क्या यह एक अधिकारी की व्यक्तिगत श्रद्धा थी या सेना के धर्मनिरपेक्ष चरित्र में कोई बड़ा बदलाव?

सेना के वरिष्ठ अधिकारी की धार्मिक मुलाकात: क्या यह सेना का धर्म से जुड़ाव है?

इस पूरी घटना को समझने के लिए पहले ये देखना जरूरी है कि क्या हुआ था:

  • यह मुलाकात एक सार्वजनिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी
  • न कोई धार्मिक नारा लगाया गया, न कोई राजनीतिक संदेश दिया गया
  • यह पूरी तरह से व्यक्तिगत श्रद्धा और सम्मान की भावना से की गई मुलाकात थी

ऐसे में यह सवाल उठाना कि क्या सेना का धर्म से जुड़ाव अब एक दिशा विशेष ले रहा है, तर्कसंगत नहीं लगता।

भारतीय सेना का धर्म से जुड़ाव: ऐतिहासिक परंपरा और सम्मान

भारतीय सेना में धर्म और आस्था का सम्मान कोई नया विषय नहीं है। यह इसकी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा रहा है।

  • सभी धर्मों के सैनिक सेना का हिस्सा हैं — हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि
  • हर रेजीमेंट की अपनी धार्मिक पहचान होती है — जैसे सिख रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट, जाट रेजीमेंट
  • पूजा के लिए सेना के बेस में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च बनाए जाते हैं
  • युद्ध घोषों में “हर हर महादेव”, “सत श्री अकाल”, “अल्लाहु अकबर”, “जय माता दी” जैसे नारे सदियों से प्रचलित हैं

इससे साफ है कि सेना का धर्म से जुड़ाव हमेशा से रहा है — लेकिन वह संतुलित और धर्मनिरपेक्ष रहा है।

सेना की धर्मनिरपेक्षता बनाम सेना का धर्म विवाद: दोहरा मापदंड?

जब भी कोई अधिकारी किसी हिंदू संत से मिलता है, तो तुरंत भगवाकरण का आरोप लग जाता है। लेकिन जब कोई राजनीतिक नेता धार्मिक स्थलों पर जाता है, तो उसे “धर्मनिरपेक्ष” कहा जाता है।

  • क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ एक धर्म को निशाना बनाना है?
  • क्या एक अधिकारी की श्रद्धा से पूरी सेना की छवि बदल जाती है?
  • जब आतंकी की धार्मिक पहचान छुपाई जाती है, तो सेना की आस्था को संदेह से क्यों देखा जाता है?

यह एक गंभीर सोचने वाला विषय है।

सेना का धर्म से जुड़ाव बनाम सेना का भगवाकरण

यहाँ दो बातों को अलग करना बेहद जरूरी है:

  1. सेना का धर्म से जुड़ाव — यानी व्यक्तिगत स्तर पर सैनिकों की आस्था, जो अनुशासन और कर्तव्य के साथ संतुलित हो
  2. सेना का भगवाकरण — यानी सेना की नीति, छवि और गतिविधियों को किसी एक धर्म की ओर मोड़ना

इस पूरे विवाद में उपेंद्र द्विवेदी की मुलाकात पहले हिस्से में आती है — यह एक व्यक्तिगत श्रद्धा थी, न कि नीति-स्तर का कोई धार्मिक एजेंडा।

सेना में धार्मिक प्रतीकों और पूजा का महत्व

सेना में धार्मिक आस्था को प्रोत्साहित नहीं किया जाता, लेकिन उसका सम्मान जरूर होता है।

  • सैनिकों की मानसिक मजबूती के लिए धर्म सहारा बनता है
  • त्योहारों को सभी धर्मों के सैनिक एक साथ मनाते हैं
  • कई बार युद्धभूमि में धार्मिक घोष सैनिकों में जोश भरते हैं

इसलिए आस्था को पूरी तरह हटाना न यथार्थ है, न जरूरी। जरूरी यह है कि उसका दुरुपयोग न हो।

राजनीति और मीडिया: सेना को निशाना क्यों बनाते हैं?

यह विवाद कई स्तरों पर राजनीतिक हो गया है:

  • कुछ पार्टियाँ इसे “भगवाकरण” कहकर सत्तारूढ़ दल पर हमला करना चाहती हैं
  • कुछ मीडिया चैनल्स इसे TRP के लिए सनसनीखेज बना रहे हैं
  • जबकि हकीकत में सेना का कोई आधिकारिक बयान या नीतिगत बदलाव नहीं हुआ है

सेना का इस्तेमाल राजनीति के लिए करना देश की सुरक्षा और गरिमा दोनों के लिए खतरा है।

क्या यह घटना भगवाकरण है?

  • क्या उपेंद्र द्विवेदी ने किसी आदेश का उल्लंघन किया? — नहीं
  • क्या उन्होंने किसी धर्म को थोपने की कोशिश की? — नहीं
  • क्या उन्होंने देशभक्ति से हटकर कुछ किया? — बिल्कुल नहीं

तो फिर इसे सेना का भगवाकरण कहना गलत है।

यह एक अधिकारी की व्यक्तिगत आस्था थी, जिसे तूल देकर राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया।

निष्कर्ष: सेना की असली पहचान — देशभक्ति और समर्पण

भारतीय सेना की सबसे बड़ी पहचान उसकी विविधता में एकता है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र — सभी को पीछे छोड़कर सैनिक सिर्फ एक बात जानते हैं:
"मैं भारत माता का सिपाही हूँ।"

धर्म और आस्था जब तक कर्तव्य और अनुशासन के साथ जुड़ी हो, तब तक वह प्रेरणा है — न कि खतरा।

सेना को राजनीति से दूर रखें।
धर्म से नहीं, द्वेष से बचाइए।
यह सेना का भगवाकरण नहीं,
बल्कि श्रद्धा पर राजनीति का शोर है।

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